भव्य मंदिर निर्माण महायज्ञ में सहयोग देकर पुण्य कमाएँ। जय श्री राम!
सादर प्रणाम ।।
नाम : स्व० भगवान दीन मिश्र
पिता : स्व० भानुप्रताप मिश्र
जन्म : 1845
मृत्यु : 1941
मूल निवास: कानपुर प्रांत उत्तर प्रदेश
दूसरा निवास: पीपरी गहरवार जालौन झांसी मंडल (उ०प्र०) अंग्रेजों से युद्ध के बाद यहां निवास किया और यही बस गए ।
अमर बलिदानी भगवान दीन जी की शौर्य गाथा
रक्तरंजित और भक्तिमय इतिहास :
प्रथम अध्याय: फिरंगी हुकूमत में तहलका और वो 'बागी' ब्राह्मण
सन् 1800 के अंतिम दशक का वह दौर था, जब उत्तर भारत की फिजाओं में बारूद और विद्रोह की गंध घुली थी। तभी एक ऐसी घटना घटी जिसने ब्रिटिश हुकूमत की जड़े हिला दीं।
कानपुर रेजिमेंट का दृश्य:
एक अंग्रेज सिपाही और उसका दस्ता, जो अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात था, उसने मर्यादा की सीमा लांघी। तभी सामने खड़ा था वो ब्राह्मण— श्री भगवान दीन जी। उनकी आँखों में वो तेज था जो अन्याय को भस्म कर दे। बिना किसी भय के, उन्होंने अकेले ही उस अंग्रेज सिपाही को उसके पूरे दस्ते (15-20 अंग्रेज सिपाही) समेत कुल्हाड़ी से चीर कर मौत के घाट उतार दिया।
रेजिमेंट के भीतर अफरा-तफरी मच गई। अंग्रेज सिपाही अपने अफसर के पास भागते हुए पहुंचे:
"Major! There is a bloody rebel out there! He killed our soldiers with bare hands! He isn't a mere man, he is a devil with divine strength!"
खबर आग की तरह फैली और कानपुर प्रांत के चीफ जनरल तक जा पहुँची। जनरल ने मेज पर हाथ पटकते हुए आदेश दिया:
"This 'Mishra' has challenged the Crown. This insolence cannot be pardoned. I order a 'Death Warrant'! Find him and hang him till death!"
द्वितीय अध्याय: महाप्रयाण – पीठ पर पुत्र और हाथों में लगाम
चारों तरफ अंग्रेज सिपाही शिकारी कुत्तों की तरह ढूँढ रहे थे। फांसी का हुक्म जारी हो चुका था। स्थितियां विपरीत थीं और अपनों में ही कुछ विद्रोही पैदा हो गए थे। ऐसे में भगवान दीन जी ने एक ऐसा निर्णय लिया जो केवल एक वज्र जैसा कलेजा रखने वाला व्यक्ति ही ले सकता था।
उन्होंने अपने नन्हे पुत्र को अपनी पीठ पर कसकर बांधा, अपने वफादार घोड़े की लगाम थामी और निकल पड़े एक अनिश्चित सफर पर। हर नाके पर गोरी सेना का पहरा था, लेकिन भगवान दीन जी की आँखों में वो प्रचंड संकल्प था जिसे मौत भी नहीं डिगा सकती थी। वे रातों-रात जंगलों और बीहड़ों को चीरते हुए आगे बढ़े।
तृतीय अध्याय: जालौन का वो स्वागत और पहचान का परित्याग
लंबे संघर्ष और अंग्रेजों को छकाने के बाद, वे झांसी मंडल के जालौन जिले में पहुंचे। धूल से सने चेहरे लेकिन आत्मविश्वास से चमकती आँखों वाले उस घुड़सवार को जब ग्राम मालपुर (पीपरी गहरवार) के जमींदारों ने देखा, तो वे पहचान गए कि यह कोई साधारण पुरुष नहीं है।
जमींदारों ने उनकी तेजस्विता को देखते हुए उन्हें शरण दी। अंग्रेजों के खौफ से अपने पुत्र को बचाने के लिए उन्होंने अपनी पहचान छिपाई, अपने कुल का नाम बदला और एक अज्ञातवास का जीवन जिया। जब समय बीत गया और संकट के बादल छंटे, तब उन्होंने अपना गौरवशाली इतिहास प्रकट किया। उनकी सच्चाई जानकर जमींदारों का सिर श्रद्धा से झुक गया। उन्होंने अपनी 'पुरानी राजा की गढ़ी' (एक ऊँचा टीला) भगवान दीन जी को दान में दे दी।
चतुर्थ अध्याय: संकल्प की सिद्धि और गढ़ी का समतलीकरण
वह गढ़ी बहुत ऊँची और दुर्गम थी। भगवान दीन जी का संकल्प था वहां एक भव्य मंदिर बनाना। उन्होंने अकेले ही उस ऊँची गढ़ी को काटना शुरू किया। लोग देखते रह गए कि कैसे एक व्यक्ति अपने फौलादी इरादों से पहाड़ जैसी गढ़ी को काटकर आस-पास के खेतों के बराबर समतल कर रहा है। उन्होंने कई हिस्से समतल कर दिए लेकिन कुछ हिस्से उन्होंने ऊंचे ही रखे क्योंकि मंदिर का इतिहास गौरवशाली और ऊंचा हो। यह उनके श्रम और आस्था की पराकाष्ठा थी।
पंचम अध्याय: हनुमान जी का विग्रह और वो अलौकिक चमत्कार
लोकमान्यता है कि हनुमान जी की एक प्राचीन प्रतिमा एक पुराने नीम के पेड़ के नीचे दबी थी। गाँव के दर्जनों बलशाली पुरुषों ने मिलकर उस प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह टस से मस न हुई।
तभी भगवान दीन जी को स्वप्न में ईश्वरीय प्रेरणा मिली। अगले दिन जो दृश्य गाँव वालों ने देखा, वह अविश्वसनीय था— जिस प्रतिमा को पूरा समूह नहीं हिला सका, उसे भगवान दीन जी ने अकेले अपने कंधों पर उठाया और गढ़ी के ऊपर ले जाकर विराजमान कर दिया। यह सिद्ध हो गया कि बजरंगबली ने स्वयं उन्हें अपना सेवक चुना है।
षष्ठ अध्याय: 1930 – संकल्प का जीवंत प्रमाण
मंदिर निर्माण में उन्होंने अपना तन-मन-धन सब झोंक दिया। यहाँ तक कि जब धन की कमी पड़ी, तो उस स्वाभिमानी सेनानी ने मंदिर के लिए झोली फैलाने (भीख मांगने) में भी संकोच नहीं किया। 100 साल से भी पहले शुरू हुआ वह यज्ञ सन् 1930 में पूर्ण हुआ, जब हनुमान जी का भव्य गर्भगृह बनकर तैयार हुआ।
आज भी उस गर्भगृह में लगा प्राचीन शिलालेख भगवान दीन जी के उस अजेय संकल्प की गवाही देता है।
श्रद्धा और साहस के प्रतीक स्व० श्री भगवान दीन मिश्र जी को हम सब प्रणाम करते हैं।
जय श्री राम।।