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उत्तर प्रदेश के जालौन जिले की पावन धरा पर स्थित त्रिपुरी धाम केवल एक आध्यात्मिक केंद्र नहीं है, बल्कि यह अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और अटूट राष्ट्रभक्ति का जीवंत प्रतीक है। इस धाम की स्थापना और यहाँ की मर्यादा के पीछे परम पूज्य स्व० पं० श्री भगवान दीन मिश्र जी का वह त्याग और बलिदान है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की जड़े हिला दी थीं।
वीरता का कालखंड (ब्रिटिश काल)
यह उस समय की बात है जब गुलामी की जंजीरें जकड़ी हुई थी और अंग्रेज अधिकारी ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात थे। श्री भगवान दीन मिश्र जी एक धर्मपरायण व्यक्ति होने के साथ-साथ अत्यंत स्वाभिमानी और साहसी थे।
लोक मान्यताओं और स्थानीय साक्ष्यों के अनुसार, जब ब्रिटिश अधिकारियों ने कानपुर प्रांत में स्थानीय लोगों पर अत्याचार करना चाहा, तब भगवान दीन जी उनके सामने ढाल बनकर खड़े हो गए।
ऐतिहासिक संघर्ष: कहा जाता है कि उन्होंने अकेले ही 15-20 अंग्रेज सैनिकों/अधिकारियों का वीरतापूर्वक सामना करते हुए अपनी ऐतिहासिक कुल्हाड़ी से धर्म रक्षा के लिए पूरे अंग्रेजी दस्ते को चीर दिया और उन्हें धूल चटाई। यह घटना आज भी क्षेत्र के बुजुर्गों की कहानियों और लोकगीतों में जीवित है। उनकी इस वीरता ने पूरे क्षेत्र में स्वाभिमान की लहर जगा दी थी।
मंदिर का संकल्प और अध्यात्म
अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष के बाद, कानपुर प्रांत में स्थितियां बदली और बदले की भावना में अंग्रेज सिपाही ने अपने रेजिमेंट के मुख्य अधिकारी से गुहार लगाई जिसके बाद कानपुर प्रांत में एक सन्नाटा छा गया, और अधिकारी ने फांसी का आदेश निकाल दिया...........!!!
अंग्रेज सिपाही उन्हें ढूंढते रहे, वे अपनी रक्त से सनी हुई कुल्हाड़ी लेकर अपने पुत्र को पीठ पर बांधकर घोड़े पे सवार होके प्रांत छोड़ के निकल आए ।
भगवान दीन जी ने अपना जीवन, धर्म और समाज सेवा को समर्पित कर दिया। उन्होंने इस पावन भूमि (वर्तमान त्रिपुरी धाम) को चुना और यहाँ एक भव्य मंदिर का संकल्प लिया। और त्रिपुरी धाम की स्थापना कर दी।
उनका मानना था कि बिना धर्म के शक्ति अधूरी है और बिना शक्ति के धर्म की रक्षा असंभव है।
यह भूमि उनके तप और बलिदान से सिंचित है, जिसे आज हम 'त्रिपुरी धाम' के नाम से जानते हैं।
निर्माण वर्ष:
मंदिर 100 वर्षों से भी अधिक प्राचीन है, पहले मंदिर में गर्भगृह नहीं था, लेकिन शक्ति की पराकाष्ठा प्रबल थी।इसके बाद भक्तों की भीड़ बढ़ती गई, तब भगवान दीन जी ने गर्भगृह का निर्माण अपने हाथों से चूना पत्थर पका कर कराया,,,आज भी प्राचीन शिखर उनके हाथ का बना हुआ है,,,,मंदिर का कायाकल्प, पहले से सुदृढ़ कर दिया और फिर मंदिर का गर्भगृह 1930 में बन कर तैयार हो गया ।
उनके नाम का प्राचीन शिलालेख आज भी गर्भगृह में लगा हुआ है।
त्रिपुरी धाम का महत्व:
यहां आने वाले हर भक्त ही इच्छा पूर्ण होती है। प्रभु यहां स्वयं विराजते हैं। हनुमान जी की दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है। उस समय तीन गांव पीपरी गहरवार, मालपुर, नौरेजपुर ने बहुत सहयोग किया,,,तीन गांव की आस्था ने मंदिर को पोषित किया ताकि मंदिर न केवल तीन गांव बल्कि पूरे भारत में आस्था का प्रतीक बने,,,,आज भी ये तीन गांव स्मरणीय है इनकी आस्था पर आज भक्त समाज और इस धरा को गर्व है।
प्रबंधन और विकास:
स्व० पं० श्री भगवान दीन मिश्र जी त्रिपुरी धाम मंदिर के संस्थापक रहे,,,,और स्वयं मंदिर का संचालन किया। इसके बाद मिश्र जी दंडी स्वामी को लाये, वे कुछ वर्षों तक ही रहे।
फिर भगवान दीन जी के पुत्र स्व० मन्नी लाल मिश्र जी ने मंदिर का संचालन किया और 1967 के दौरान मंदिर अध्यक्ष रहे ।
उसी समय आदरणीय मन्नी लाल मिश्र शास्त्री जी एक सिद्ध संत अचिंत्य विद्यानंद महाराज जी को लेकर आए। और मंदिर पर पुजारी के रूप में नियुक्त किया । इसके बाद भी कई संतो ने सेवादारी की।
मन्नी लाल मिश्र (शास्त्री जी) के निधन के बाद सब भक्तों ने संस्थापक परिवार के साथ कार्य जारी रखा और वर्षों से होती आ रही वार्षिक भागवत आदि का आयोजन जारी रखा।
इसके बाद स्व श्री मन्नी लाल शास्त्री जी के पुत्र कृष्ण गोपाल मिश्र जी वर्तमान मंदिर अध्यक्ष संकट हरण त्रिपुरी धाम ग्राम पीपरी गहरवार, मालपुर जालौन के रूप में भक्तों के सहयोग से विकास कार्य आगे बढ़ा रहे हैं ।
कृष्ण गोपाल मिश्र जी और संस्थापक परिवार के द्वारा बिना किसी निजी लाभ के आज भी अपनी मंदिर से लगी भूमि पर वर्षों से कोई अन्न नहीं उगाया, अपनी जमीन को अपने मंदिर के लिए समर्पित रखते हुए, मेले इत्यादि से प्राप्त राजस्व मंदिर के बेहतर प्रबंधन और विकास हेतु सौंप दिया। ये हमारे पूर्वज स्व भगवान दीन मिश्र जी के त्याग और प्रेरणा का प्रतीक है।
विरासत और वर्तमान
आज भगवान दीन जी के पौत्र कृष्ण गोपाल मिश्र (मंदिर अध्यक्ष) और पूरा संस्थापक परिवार अपनी पूरी निष्ठा से मंदिर को सींच रहे हैं।"
'संकट हरण त्रिपुरी धाम मंदिर समिति' उसी महान उद्देश्य को पूरे ग्राम वासियों और भक्तों के सहयोग से आगे बढ़ा रही है जिसे श्री भगवान दीन मिश्र जी ने शुरू किया था।
कानूनी व्यवस्था: हम मंदिर की संपत्तियों को सुरक्षित करने और व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी (पंजीकृत) बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
मर्यादा: मंदिर परिसर में किसी भी प्रकार की अनैतिक गतिविधि या अवैध कब्जे को रोकना ही भगवान दीन जी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है
हमारी पंजीकृत समिति मंदिर का विकास राष्ट्रीय स्तर पर चाहती हैं। जय श्री राम।